विक्रांत पाटील
एक ऐसा राजा जिसे इतिहास ने कभी पूरा न पढ़ाया।
दिल्ली के लाल क़िले पर तिरंगा फहराता है, वहाँ रणजीत सिंह की याद नहीं।
मुम्बई की पाठ्यपुस्तकों में मुगलों के अध्याय हैं, अंग्रेज़ों के अध्याय हैं, पर जिस एक राजा ने सदियों बाद पहली बार किसी भारतीय को अफ़गानिस्तान में घुसकर जीत का एहसास दिलाया, उसका ज़िक्र बस एक-दो पंक्तियों में है।
रणजीत सिंह एक हज़ार साल में पहले ऐसे भारतीय शासक थे जिन्होंने आक्रमण की लहर को उल्टा कर दिया और भारत के पारम्परिक विजेताओं, पठानों को उनके ही घर में हराया। इसीलिए वे ‘शेर-ए-पंजाब’ के नाम से जाने जाते हैं।
एक हज़ार साल। सोचिए, एक हज़ार साल से भारत पर हमले होते आए थे। कोई रोक नहीं पाया। और फिर एक आया, जिसकी एक आँख नहीं थी, चेहरे पर चेचक के दाग थे, कद छोटा था और उसने वो कर दिखाया, जो किसी ने नहीं किया।
यह उनकी कहानी है। वो कहानी, जो पूरी कभी नहीं सुनाई गई।

पहला अध्याय : गुजरांवाला का वो लड़का जिसे चेचक भी नहीं तोड़ पाई
13 नवम्बर 1780 को गुजरांवाला में, जो आज पाकिस्तान में है, महासिंह के घर एक बच्चे ने जन्म लिया। उन दिनों पंजाब पर सिखों और अफ़गानों का राज चलता था, जिन्होंने पूरे इलाक़े को कई मिसलों में बाँट रखा था।
छोटी उम्र में भयानक चेचक ने उस बच्चे को जकड़ लिया।
बुख़ार। दर्द। बदन पर छाले। और जब बुख़ार उतरा, तो एक आँख की रोशनी जा चुकी थी। चेहरे पर गहरे दाग। जो भी देखता, कहता – “यह बच्चा बड़ा होकर क्या करेगा?”
लेकिन उस एक आँख में जो आग थी, वो दोनों आँखों वाले राजाओं में नहीं थी।
बाद में जब किसी ने उनसे पूछा कि एक आँख न होने का दुःख नहीं होता? – तो रणजीत सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा, *”इससे मुझे चीज़ें और भी पैनी नज़र से दिखती हैं।”
और सच में, उस एक आँख ने जो देखा, वो इतिहास ने दर्ज किया।
महज़ 12 साल की उम्र में पिता चल बसे और राजपाट का सारा बोझ उन्हीं के कंधों पर आ गया। और 10 साल की उम्र में उन्होंने पहला युद्ध लड़ा।
दस साल। जब बच्चे गुल्ली-डंडा खेलते हैं, तब रणजीत सिंह तलवार उठा रहे थे।
दूसरा अध्याय : सदाकौर – वो सास जिसने शेर बनाया
सोलह वर्ष की आयु में रणजीत सिंह का विवाह कन्हैया मिसल के सरदार जयसिंह की पुत्री मेहताब कौर से हुआ। इनकी सास का नाम था – सदाकौर
सदाकौर। एक विधवा सरदारनी।
जो महिला थी, लेकिन किसी सरदार से कम नहीं थी। उसने देखा कि उसके दामाद रणजीत सिंह में एक असाधारण क्षमता है। उसने उन्हें सिर्फ़ दामाद नहीं माना – उन्हें राजा बनाया।
इतिहासकारों ने रानी सदाकौर और सरबत खालसा के उस महत्वपूर्ण योगदान के साथ न्याय नहीं किया, जिसने सिख साम्राज्य की नींव रखी। जब अफ़गान शासक शाह ज़मान 30,000 की सेना लेकर भारत पर चढ़ा आया और सभी सिख सरदार लड़ने से डर रहे थे, तब सदाकौर ने रणजीत सिंह की ओर से अमृतसर में सरबत खालसा बुलाया।
सरबत खालसा – यानी सभी सिखों की महापंचायत।
उस सभा में सदाकौर ने सिख मिसलदारों को ललकारते हुए कहा – “खालसा जी, अगर आप लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा सकते, तो मैं पंजाब की इज़्ज़त बचाने के लिए लड़ते-लड़ते मर जाऊँगी।”
एक औरत की यह ललकार – पूरे दरबार को जगा गई।
और तब 19 साल के रणजीत सिंह को सदाकौर की कोशिशों से सेना का नेतृत्व सौंपा गया। उन्होंने लाहौर किले पर घेरा डाला और शाह ज़मान को सीधे युद्ध के लिए ललकारा। हताश और पराजित शाह ज़मान काबुल लौट गया और रणजीत सिंह सिखों के माने हुए नेता बन गए।
19 साल। एक ललकार। और एक साम्राज्य की शुरुआत।

तीसरा अध्याय : वो तोपें और एक चतुर दाँव
यह एक ऐसी घटना हैं, जो इतिहास की किताबों में नहीं, पर इतिहास बदल देती है।
सन् 1798।
अफ़गानिस्तान के शाह ज़मान ने पंजाब पर हमला किया। लूटा। उजाड़ा। और वापस जाने लगा।
लौटते समय उसकी कुछ क़ीमती तोपें झेलम नदी में गिर पड़ीं।
अब रणजीत सिंह के सामने दो रास्ते थे।
पहला – तोपें रख लो। दुश्मन की तोपें मिल गईं, तो सेना मज़बूत होगी।
दूसरा – वापस कर दो।
सब लोग सोचते थे – तोपें रख लेंगे।
रणजीत सिंह ने उन 12 तोपों को नदी से निकलवाया और शाह ज़मान को वापस भेज दिया।
क्यों?
क्योंकि रणजीत सिंह की नज़र बड़ी थी। तोपें तो मिल जातीं, पर शाह ज़मान का भरोसा मिला।
इस कार्रवाई से प्रसन्न होकर जमानशाह ने रणजीत सिंह को न केवल ‘राजा’ की उपाधि दी, बल्कि लाहौर पर भी अधिकार करने की अनुमति दे दी।
12 तोपें छोड़ीं – लाहौर मिला।
यह कूटनीति थी, शतरंज के खिलाड़ी की। और रणजीत सिंह यही थे – वो शतरंज के खिलाड़ी जो हर चाल दस क़दम आगे सोच कर चलते थे।
चौथा अध्याय : लाहौर की रात – एक किला, एक सपना
7 जुलाई 1799।
रात का अँधेरा। लाहौर के क़िले की मज़बूत दीवारें। और बाहर – एक 19 साल का नौजवान।
महाराजा रणजीत सिंह ने लाहौर किले में विजेता के रूप में प्रवेश किया।
पर रात भर वे सो नहीं सके।
किले के ऊँचे बुर्ज पर खड़े होकर उन्होंने देखा – पूरा लाहौर। रोशनियाँ। बाज़ार। मस्जिदें। मंदिर। गुरुद्वारे।
लाहौर के सूफ़ी मुसलमानों और हिंदुओं ने रणजीत सिंह के शासन का स्वागत किया।
यह कोई छोटी बात नहीं थी। एक सिख राजा आया था – और मुसलमान और हिंदू खुश थे।
क्योंकि, रणजीत सिंह जानते थे – राजा वो होता है, जो सबका हो।

पाँचवाँ अध्याय : 12 अप्रैल 1801 – एक ताजपोशी जो इतिहास में अनोखी थी
12 अप्रैल 1801 को रणजीत सिंह ने महाराजा की उपाधि ग्रहण की। गुरु नानक जी के एक वंशज ने उनकी ताजपोशी संपन्न कराई। ताजपोशी के दिन उनके राज्य में मस्जिदों, मंदिरों और गुरुद्वारों में उनकी लम्बी उम्र के लिए प्रार्थनाएँ हुईं।
एक सिख राजा। और उसकी ताजपोशी पर – मस्जिदों में दुआ, मंदिरों में आरती, गुरुद्वारों में अरदास।
यह भारत था। इसी भारत की परम्परा थी। और रणजीत सिंह उसी परम्परा के असली वारिस थे।
रणजीत सिंह ने अपने शासन को ‘सरकार खालसा’ और अपने दरबार को ‘दरबार खालसा’ कहा। वे खुद को कभी महाराजा नहीं, खालसा पंथ का एक विनम्र सेवक मानते थे।
वे कभी सिंहासन पर नहीं बैठते थे। अपने दरबार में वे पालथी मारकर कुर्सी पर बैठते थे। अपनी पगड़ी या पोशाक में कोई राजकीय प्रतीक नहीं जोड़ते थे। अपने दरबारियों से कहते थे – “मैं एक किसान और सैनिक हूँ और बाहरी दिखावे की परवाह नहीं करता। मेरी तलवार ही मुझे वो सम्मान दिलाने के लिए काफ़ी है जो मुझे चाहिए।”
सिंहासन पर न बैठने वाला राजा – और एशिया के सबसे शक्तिशाली साम्राज्यों में से एक का स्वामी।
छठा अध्याय : अमृतसर – वो पवित्र नगरी जो ख़तरे में थी
अमृतसर। हरमंदिर साहिब।
सिखों का सबसे पवित्र तीर्थस्थल। जहाँ अमृत सरोवर है। जहाँ गुरुओं का आशीर्वाद है।
पर यह शहर – बरसों से लहूलुहान था।
अहमद शाह अब्दाली ने हरमंदिर साहिब पर बार-बार हमले किए थे। सिखों ने बार-बार उसे दोबारा बनाया था।
और अब एक नई चुनौती थी।
भंगी मिसल के सरदारों के हाथ में अमृतसर था। वे शक्तिशाली थे – पर अनुशासन नहीं था। शहर में लूट-खसोट। गुरुद्वारे की देखभाल नहीं। हरमंदिर साहिब की हालत जर्जर।
और बाहर से – अफ़गान हमलों का ख़तरा लगातार।
रणजीत सिंह के मन में एक ही सवाल था – “क्या मैं अमृतसर को बचा सकता हूँ?”
सातवाँ अध्याय : सरबत खालसा का वो ऐलान, जिसने इतिहास बदल दिया
सदाकौर ने रणजीत सिंह की ओर से अमृतसर में सरबत खालसा बुलाया।
हज़ारों सिख एकत्र हुए। विभिन्न मिसलों के सरदार। बुज़ुर्ग। जवान। सब एक जगह।
रणजीत सिंह खड़े हुए।
वे राजा थे – पर आज वे सेवक की तरह बोले।
उन्होंने कहा, “यह हरमंदिर साहिब हम सबका है। यह पूरे खालसे का है। मैं इसे बचाने का वादा करता हूँ, लेकिन अकेले नहीं। सरबत खालसा के साथ।”
1805 में रणजीत सिंह ने भंगी मिसल से अमृतसर ले लिया।
पर यह सिर्फ़ एक विजय नहीं थी। यह एक संकल्प था।
हरमंदिर साहिब अब सुरक्षित हाथों में था।
क्रमशः…
(अगला भाग शनिवारको..)














